अण्डकोष के रोग के कारण

चोट(Injury)-

कई बार चोट लग जाने या दब जाने से अण्डकोष को भारि हानि पहुंचती है। चोट लगने पर अण्ड ऊपर खिसक जाने से आघात से बच जाते हैं। चोट लगने से कई बार अत्यधिक रक्त बहने लग जाता है और रूकने में नहीं आता। चोट लगने पर अण्डकोष का माँस तो नहीं फटता, परन्तु अण्डकोष के चर्म के अंदर रक्त निकल कर गुठली का रूप धारण कर लेता है। चर्म में रक्त की गुठली बन जाने को रक्तार्बुद या अंग्रेजी में Hematoma कहते हैं। चोट लगने से बहुत अधिक छिल जाने पर तथा चर्म में रक्त की गुठली बन जाने से रोगी के लिंग का रंग बहुत बुरा हो जाता है।

चिकित्सा-

मामूली चोट लग जाने पर ठण्डे जल में कपड़े की गद्दी रखकर नर्मी से लंगोट बाँधकर अण्डकोष को उठाकर सहारा देने से दर्द, कष्ट दूर हो जाता है। रक्त बहना भी रूक जाता है। बहुत रक्त बहने को रोकने के लिए उस स्थान पर लिंगेचर बाँधने की भी जरूरत पड़ती है। आराम आ जाने पर चर्म में जमा रक्त कई सप्ताह में धीरे-धीरे दूर होता है। परन्तु अण्डकोष में संक्रमण होने को बचाना बहुत ही जरूरी है।

शोथ-

अण्डकोष के चर्म में सूजन हो जाने से चर्म लाल तथा गीला-सा हो जाता है। मोटे मनुष्यों और बच्चों में यह कष्ट प्रायः हो जाता है। सफाई रखने, प्रतिदिन धोते रहने से कष्ट कम हो जाता है। टेलकम पाउडर चर्म पर छिड़कने व मलने से भी आराम आ जाता है। अण्डकोष में खुजली होने पर ध्यान से निरीक्षण करें। जुएँ पड़ जाने से भी सूजन और खुजली होने लग जाती है। मूत्राँगों में नासूर हो जाने पर मूत्र रिस-रिसकर अण्डकोष में पहुंच जाने से भी खुजली होने लग जाती है।

अण्डकोष में सूजन या पानी पड़ जाने से अण्डकोष की कोशिकाओं में सूजन हो जाती है। ऐसी अवस्था में अण्डकोष में चीरा लगाकर इसकी चिकित्सा की जाती है। अण्डकोष की सूजन में फोड़े भी हो जाते हैं। सुजाक, पीप उत्पन्न करने और क्षय के कीटाणुओं से भी अण्डकोष में फोड़े हो जाते हैं। समय पर चिकित्सा न करने से अण्डकोष का चर्म मोटा हो जाता है, अण्डकोष में पानी पड़ सकता है। जिन रोगियों की टाँग हाथी के पाँव की भाँति मोटी हो जाती है, उनके अण्डकोष में तन्तु उत्पन्न हो जाते हैं। कारण का निरीक्षण करके रोग को दूर करें।

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